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वाल्मीकि रामायण 28.41

प्रमत्त संनाददित बर्हिणानिस शक्रगोप अकुल शाद्वलानि ।
चरन्ति नीप अर्जुन वासितानिगजाः सुरम्याणि वन अन्तराणि ॥४-२८-४१॥

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