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वाल्मीकि रामायण 28.23

मेघ अभिकामा परिसंपतन्तीसम्मोदिता भाति बलाक पंक्तिः ।
वात अवधूता वर पौण्डरीकीलंब इव माला रुचिर अंबरस्य ॥४-२८-२३॥

पूरा अध्याय