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वाल्मीकि रामायण 28.21

वर्ष उदक आअप्यायित शाद्वलानिप्रवृत्त नृत्त उत्सव बर्हिणानि ।
वनानि निर्वृष्ट बलाहकानिपश्य अपराह्णेषु अधिकम् विभान्ति ॥४-२८-२१॥

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