वाल्मीकि रामायण 24.18
अंहो बतेदम् नृ वर अविषह्य निवर्तते मे हृदि साधु वृत्तम् ।
अग्नौ विवर्णम् परितप्य मानम् किट्टम् यथा राघव जात रूपम् ॥४-२४-१८॥
अंहो बतेदम् नृ वर अविषह्य निवर्तते मे हृदि साधु वृत्तम् ।
अग्नौ विवर्णम् परितप्य मानम् किट्टम् यथा राघव जात रूपम् ॥४-२४-१८॥