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वाल्मीकि रामायण 24.17

सोदर्य अघाता अपर गात्र वालः संताप हस्त अक्षि शिरो विषाणः ।
एनोमयो माम् अभिहन्ति हस्ती दृप्तो नदी कूलम् इव प्रवृद्धः ॥४-२४-१७॥

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