ग्रंथवाल्मीकि रामायणकिष्किन्धाकाण्डसर्ग 2323.7वाल्मीकि रामायण 23.7शायिता निहता यत्र त्वया एव रिपवः पुरा । विशुद्ध सत्त्व अभिजन प्रिययुद्ध मम प्रिय ॥४-२३-७॥पिछलाअगलापूरा अध्याय