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वाल्मीकि रामायण 19.22

क्षेप्तारम् पर्वत इन्द्राणाम् वज्राणाम् इव वासवम् ।
महावात समाविष्टम् महामेघ औघ निःस्वनम् ॥४-१९-२२॥

पूरा अध्याय