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वाल्मीकि रामायण 17.23

सताम् वेष धरम् पापम् प्रच्छन्नम् इव पावकम् ।
न अहम् त्वाम् अभिजानामि धर्म छद्माभि संवृतम् ॥४-१७-२३॥

पूरा अध्याय