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वाल्मीकि रामायण 58.19

विगर्हमाणो अनुजम् आर्त रूपम्क्षुधा श्रमेण एव पिपासया च ।
विनिःश्वसन् शुष्क मुखो विषण्णःप्रतिश्रयम् प्राप्य समीक्ष्य शून्यम् ॥३-५८-१९॥

पूरा अध्याय