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वाल्मीकि रामायण 53.19

व्यक्तम् हिरण्मयान् हि त्वम् संपश्यसि मही रुहान् ।
नदीम् वैतरणीम् घोराम् रुधिर ओघ विवाहिनीम् ॥३-५३-१९॥

पूरा अध्याय