ग्रंथवाल्मीकि रामायणअरण्यकाण्डसर्ग 5353.1वाल्मीकि रामायण 53.1खम् उत्पतन्तम् तम् दृष्ट्वा मैथिली जनक आत्मजा । दुःखिता परम उद्विग्ना भये महति वर्तिनी ॥३-५३-१॥अगलापूरा अध्याय