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वाल्मीकि रामायण 51.44

तम् दृष्ट्वा पतितम् भूमौ क्षतज आर्द्रम् जटायुषम् ।
अभ्यधावत वैदेही स्व बंधुम् इव दुःखिता ॥३-५१-४४॥

पूरा अध्याय