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वाल्मीकि रामायण 48.21

कथम् वैश्रवणम् देवम् सर्व देव नमस्कृतम् ।
भ्रातरम् व्यपदिश्य त्वम् अशुभम् कर्तुम् इच्छसि ॥३-४८-२१॥

पूरा अध्याय