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वाल्मीकि रामायण 47.32

रावणेन एवम् उक्ता तु कुपिता जनक आत्मजा ।
प्रत्युवाच अनवद्यांगी तम् अनादृत्य राक्षसम् ॥३-४७-३२॥

पूरा अध्याय