ग्रंथवाल्मीकि रामायणअरण्यकाण्डसर्ग 4343.15वाल्मीकि रामायण 43.15अहो रूपम् अहो लक्ष्मीः स्वर संपत् च शोभना । मृगो अद्भुतो विचित्रांगो हृदयम् हरति इव मे ॥३-४३-१५॥पिछलाअगलापूरा अध्याय