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वाल्मीकि रामायण 43.14

नाना वर्ण विचित्र अंगो रत्न भूतो मम अग्रतः ।
द्योतयन् वनम् अव्यग्रम् शोभते शशि संनिभः ॥३-४३-१४॥

पूरा अध्याय