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वाल्मीकि रामायण 42.34

विस्मयात् उत्फुल्ल नयना स स्नेहम् समुदैक्षत ।
स च ताम् राम दयिताम् पश्यन् मायामयो मृगः ॥३-४२-३४॥

पूरा अध्याय