ग्रंथवाल्मीकि रामायणअरण्यकाण्डसर्ग 4242.15वाल्मीकि रामायण 42.15मृगो भूत्वा आश्रम द्वारि रामस्य विचचार ह । स तु रूपम् समास्थाय महत् अद्भुत दर्शनम् ॥३-४२-१५॥पिछलाअगलापूरा अध्याय