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वाल्मीकि रामायण 17.12

शरीरज समाविष्टा राक्षसी रामम् अब्रवीत् ।
जटी तापस रूपेण सभार्यः शर चाप धृक् ॥३-१७-१२॥

पूरा अध्याय