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वाल्मीकि रामायण 89.5

कच्चित्सुखं नदीतीरे ऽवात्सीः काकुत्स्थ शर्वरीम् ।
कच्चित्ते सहसैन्यस्य तावत्सर्वमनामयम् ।। २.८९.५ ।।

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