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वाल्मीकि रामायण 82.15

यद्द् हि मात्रा कृतम् पापम् न अहम् तत् अभिरोचये ।
इहस्थो वन दुर्गस्थम् नमस्यामि कृत अन्जलिः ॥२-८२-१५॥

पूरा अध्याय