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वाल्मीकि रामायण 72.4

सा तम् मूर्ध्नि समुपाघ्राय परिष्वज्य यशस्विनम् ।
अङ्के भरतम् आरोप्य प्रष्टुम् समुपचक्रमे ॥२-७२-४॥

पूरा अध्याय