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वाल्मीकि रामायण 72.25

दानयज्ञाधिकारा हि शीलश्रुतिवचोनुगा ।
बुद्धिस्ते बुद्धिसम्पन्न प्रभेवार्कस्य मन्दिरे ॥२-७२-२५॥

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