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वाल्मीकि रामायण 72.17

हा हातोऽस्मीति कृपणाम् दीनाम् वाचमुदीरयन् ।
निपपात महाबाहुर्बाहु विक्षिप्य वीर्यवान् ॥२-७२-१७॥

पूरा अध्याय