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वाल्मीकि रामायण 66.25

बाष्प पर्याकुल जना हाहा भूत कुल अन्गना ।
शून्य चत्वर वेश्म अन्ता न बभ्राज यथा पुरम् ॥२-६६-२५॥

पूरा अध्याय