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वाल्मीकि रामायण 64.35

कन्द मूल फलम् हृत्वा को माम् प्रियम् इव अतिथिम् ।
भोजयिष्यति अकर्मण्यम् अप्रग्रहम् अनायकम् ॥२-६४-३५॥

पूरा अध्याय