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वाल्मीकि रामायण 58.4

राजा तु रजसा सूतम् ध्वस्त अङ्गम् समुपस्थितम् ।
अश्रु पूर्ण मुखम् दीनम् उवाच परम आर्तवत् ॥२-५८-४॥

पूरा अध्याय