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वाल्मीकि रामायण 58.3

वृद्धम् परम सम्तप्तम् नव ग्रहम् इव द्विपम् ।
विनिःश्वसन्तम् ध्यायन्तम् अस्वस्थम् इव कुन्जरम् ॥२-५८-३॥

पूरा अध्याय