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वाल्मीकि रामायण 57.31

देव यस्या भयात् रामम् न अनुपृच्चसि सारथिम् ।
न इह तिष्ठति कैकेयी विश्रब्धम् प्रतिभाष्यताम् ॥२-५७-३१॥

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