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वाल्मीकि रामायण 47.18

चन्द्रहीनमिवाकाशम् तोयहीनमिवार्णवम् ।
अपश्यन्निहतानन्दम् नगरम् ते विचेतसः ॥२-४७-१८॥

पूरा अध्याय