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वाल्मीकि रामायण 34.45

न हि मे काम्क्षितम् राज्यम् सुखमात्मनि वा प्रियम् ।
यथा निदेशम् कर्तुम् वै तवैव रघुनन्धन ॥२-३४-४५॥

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