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वाल्मीकि रामायण 34.32

न हि सत्यात्मनस्तात धर्माभिमनसस्तव ।
विनिवर्त यितुं बुद्धि शक्यते रघुनन्दन ॥२-३४-३२॥

पूरा अध्याय