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वाल्मीकि रामायण 23.33

खड्ग निष्पेष निष्पिष्टैः गहना दुश्चरा च मे ।
हस्ति अश्व नर हस्त ऊरु शिरोभिर् भविता मही ॥२-२३-३३॥

पूरा अध्याय