वाल्मीकि रामायण 21.55
अहम् हि ते लक्ष्मण नित्यमेव ।
जानामि भक्तिम् च पराक्रमम् च ।मम त्वभिप्राय मसन्निरीक्ष्य ।मात्रा सहाभ्यर्दसि मा सुदुःखम् ॥२-२१-५५॥
अहम् हि ते लक्ष्मण नित्यमेव ।
जानामि भक्तिम् च पराक्रमम् च ।मम त्वभिप्राय मसन्निरीक्ष्य ।मात्रा सहाभ्यर्दसि मा सुदुःखम् ॥२-२१-५५॥