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वाल्मीकि रामायण 21.52

किम् जीवितेनेह विना त्वया मे ।
लोकेन वा किम् स्वधयाऽमृतेन ।श्रेयो मुहूर्तम् तव सन्निधानम् ।ममेह कृत्स्नादपि जीवलोकात् ॥२-२१-५२॥

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