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वाल्मीकि रामायण 16.37

सिम्हनादाश्च शूराणाम् तदा शुश्रुविरे पथि ।
हर्म्यवातायनस्थाभिर्भूषिताभिः समन्ततः ॥२-१६-३७॥

पूरा अध्याय