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वाल्मीकि रामायण 118.32

ततः प्रहृष्टो धर्मात्मा पिता मे मिथिलाधिपः ।
अवाप्तो विपुलामृद्धिं मामवाप्य नराधिपः ॥ २.११८.३२॥

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