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वाल्मीकि रामायण 114.14

क्षीणपानोत्तमैर्भिन्नैः शरावैरभिसंवृताम् ।
हतशौण्डामिवाकाशे पानभूमिमसंस्कृताम् ॥ २.११४.१४॥

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