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वाल्मीकि रामायण 111.13

इह मे स्थण्डिले शीघ्रं कुशानास्तर सारथे ।
आर्य्यं प्रत्युपवेक्ष्यामि यावन्मे न प्रसीदति ॥ २.१११.१३॥

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