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वाल्मीकि रामायण 105.44

धीर्मिकेणानृशंसेन नरेण गुरुवर्त्तिना ।
भवितव्यं नरव्याघ्र परलोकं जिगीषता ॥ २.१०५.४४॥

पूरा अध्याय