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वाल्मीकि रामायण 105.37

स जीर्णं मानुषं देहं परित्यज्य पिता हि नः ।
दैवीमृद्धिमनुप्राप्तो ब्रह्मलोकविहारिणीम् ॥ २.१०५.३७॥

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