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वाल्मीकि रामायण 104.17

न दोषं त्वयि पश्यामि सूक्ष्ममप्यरिसूदन ।
न चापि जननीं बाल्यात्त्वं विगर्हितुमर्हसि ॥ २.१०४.१७॥

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