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वाल्मीकि रामायण 1.38

मत्तः प्रियतरो लोके पर्ङन्य इव वृष्टिमान् ।
यमशक्रसमो वीर्ये बृहस्पतिसमो मतौ ॥२-१-३८॥

पूरा अध्याय