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वाल्मीकि रामायण 68.5

कुशलम् च अव्ययम् चैव स उपाध्याय पुरोहितम् ।
जनकः त्वाम् महाराज पृच्छते स पुरः सरम् ॥१-६८-५॥

पूरा अध्याय