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वाल्मीकि रामायण 18.54

यस्माद् विप्रेन्द्रम् अद्राक्षम् सुप्रभाता निशा मम ।
पूर्वम् राजर्षि शब्देन तपसा द्योतित प्रभः ॥१-१८-५४॥

पूरा अध्याय