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ऋग्वेद 81.1

प्रत्यु॑ अदर्श्याय॒त्यु१च्छन्ती॑ दुहि॒ता दि॒वः ।
अपो॒ महि॑ व्ययति॒ चक्ष॑से॒ तमो॒ ज्योति॑ष्कृणोति सू॒नरी॑ ॥१॥

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