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ऋग्वेद 45.33

तत्सु नो॒ विश्वे॑ अ॒र्य आ सदा॑ गृणन्ति का॒रव॑ः । बृ॒बुं स॑हस्र॒दात॑मं सू॒रिं स॑हस्र॒सात॑मम् ॥३३॥

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