ग्रंथऋग्वेदमण्डल 5सूक्त 6161.7ऋग्वेद 61.7वि या जा॒नाति॒ जसु॑रिं॒ वि तृष्य॑न्तं॒ वि का॒मिन॑म् । दे॒व॒त्रा कृ॑णु॒ते मन॑ः ॥७॥पिछलाअगलापूरा अध्याय