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ऋग्वेद 41.17

त्वे विश्वा॑ सरस्वति श्रि॒तायूं॑षि दे॒व्याम् ।
शु॒नहो॑त्रेषु मत्स्व प्र॒जां दे॑वि दिदिड्ढि नः ॥१७॥

पूरा अध्याय