ग्रंथऋग्वेदमण्डल 10सूक्त 5858.2ऋग्वेद 58.2यत्ते॒ दिवं॒ यत्पृ॑थि॒वीं मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् । तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑ ॥२॥पिछलाअगलापूरा अध्याय